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Friday, 19 January 2018

इक कप चाय

सूनो, रुक कर अपनी वह बात बताना,
भैय्या, पहले इक कप चाय पिलाना।

सवेरे-सवेरे ही उस का दिख जाना,
जैसे सुस्त देह में जान आ जाना।

सुर-सुर चुस्की लेते जाना,
संग उसके अखबार पलटते जाना।

दोपहर की नींद से खुद को आज़ाद कराना,
चाय! सुनते ही पहला कप अपना भरवाना।

चाय में कूचा हुआ अदरक पड़ जाना,
पी कर उसको, 'वाह!' निकल जाना।

हर वक्त कोई न कोई बहाना बनाना,
उसी बहाने टपरी पर चाय पीने जाना।

यादव, गोलार, साठे, शेख़ का मिल जाना,
उस इक कप चाय पर सारी बहस सुलझाना।

मेहमान-नवाजी हो या कहीं से थक कर आना,
बिना चाय कुछ नहीं है हो पाना।

इसलिए सब यही कहे, मर्द हो या जनाना,
भैय्या, पहले इक कप चाय पिलाना।

Wednesday, 10 January 2018

खुद को ज़िंदा कर

रोज़-रोज़ क्युँ सोचता है कि क्या कर,
बस कर, कुछ कर, खुद को ज़िंदा कर।

अब करुँगा, तब करुँगा, कुछ कर तो सही,
ये अब नहीं आया, वो तब नहीं आएगा,
यू ही सोचते-सोचते ये वक्त बढ़ा जाएगा।

सोचता है तो सही सोच, कुछ और सोच, क्या करेगा?
और जो सोच लिया, तो कर वही, रुका क्या करेगा।

बढ़ेगा तभी जब लड़ेगा, पर तु खड़ा ही लड़ सकेगा?
लड़-झगड़ और पार कर, कर-कर कुछ काम कर।

उसने कहा, उससे सुना, कहा-सुना, क्या सुना, ठीक सुना?
अब बस कर सुनना, अब काम कर जो सब सुने।

रोज़-रोज़ क्युँ सोचता है कि क्या कर,
बस कर, कुछ कर, खुद को ज़िंदा कर।

Tuesday, 9 January 2018

जिन्दगी

कुछ रूक सी गई है जिन्दगी,
नई सुबह नही, पुरानी शाम हो गई है जिन्दगी।

पुराने ऐल्बम में उस तस्वीर सी,
फिके-पीले, कोडैक कागज़ के चौकोन टुकड़े जैसी,
कुछ धुंधला-सी गई है जिन्दगी।

चलता पंखा या ए-सी ऑफिस का,
दोनों की ही हवा ठंडा नही कर पा रही,
कुछ गर्मा-सी गई है जिन्दगी।

ट्रेफिक हो या लाइन ए-टी-एम की,
आगे बढ़ने का नाम ही नही ले रही है,
कुछ उक्ता-सी गई है जिन्दगी।

खबर अच्छी हो या कोई बुरी,
कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नही कर पा रही है,
कुछ बौरा-सी गई है जिन्दगी।

Sunday, 2 February 2014

यकीन

तेरे होने ना होने पे यकीन नहीं होता है।

जब छोटा था चीज़ो कि समझ नही थी मुझमें,
हमेशा बड़ी अचरज मे रहता,
बड़े जो समझाते उसे हि सच मान लिया करता,
हर जवाब में सवाल निकाल लिया करता।


समय बीता, शरीर बढ़ा अक्ल बढ़ी,

अब मेरा सवाल पुछना कुछ कम हो गया है,
जिन सवालों से अचरज हुआ करता था,
अब उन सवालों के जवाब गुगल कर लेता हुँ।

लेकिन बड़ी असमंजसता मे फँस गया हुँ,

जिन सवालों के जवाब सिधे-सरल लगते थे,
अब उन्ही के जवाब पा सन्तुष्ट नहीं होता,
इसलिए तेरे होने ना होने पे यकीन नही होता है।

बहुत कहते है तु है कुछ नही भी,

देखता हुँ किसी को-
परेशान, भूखा, डरता या मरता,
एक ही सवाल फिर उठ खड़ा होता है,
तेरे होने ना होने पे यकीन नही होता है।




Wednesday, 28 August 2013

मुसाफ़िर

एक मुसाफ़िर घर से निकला,
दिल में कई अरमान थे,
एक ओर जंगल ही जंगल,
एक ओर शमशान थे,
मुसाफ़िर के कदम पड़े हड्डी पर,
हड्डी के यह बयान थे,
चलने वाले सम्भल कर चलो,

कुछ दिन पहले हम भी इंसान थे।

-गुमनाम।