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Wednesday, 10 January 2018

खुद को ज़िंदा कर

रोज़-रोज़ क्युँ सोचता है कि क्या कर,
बस कर, कुछ कर, खुद को ज़िंदा कर।

अब करुँगा, तब करुँगा, कुछ कर तो सही,
ये अब नहीं आया, वो तब नहीं आएगा,
यू ही सोचते-सोचते ये वक्त बढ़ा जाएगा।

सोचता है तो सही सोच, कुछ और सोच, क्या करेगा?
और जो सोच लिया, तो कर वही, रुका क्या करेगा।

बढ़ेगा तभी जब लड़ेगा, पर तु खड़ा ही लड़ सकेगा?
लड़-झगड़ और पार कर, कर-कर कुछ काम कर।

उसने कहा, उससे सुना, कहा-सुना, क्या सुना, ठीक सुना?
अब बस कर सुनना, अब काम कर जो सब सुने।

रोज़-रोज़ क्युँ सोचता है कि क्या कर,
बस कर, कुछ कर, खुद को ज़िंदा कर।

Tuesday, 9 January 2018

जिन्दगी

कुछ रूक सी गई है जिन्दगी,
नई सुबह नही, पुरानी शाम हो गई है जिन्दगी।

पुराने ऐल्बम में उस तस्वीर सी,
फिके-पीले, कोडैक कागज़ के चौकोन टुकड़े जैसी,
कुछ धुंधला-सी गई है जिन्दगी।

चलता पंखा या ए-सी ऑफिस का,
दोनों की ही हवा ठंडा नही कर पा रही,
कुछ गर्मा-सी गई है जिन्दगी।

ट्रेफिक हो या लाइन ए-टी-एम की,
आगे बढ़ने का नाम ही नही ले रही है,
कुछ उक्ता-सी गई है जिन्दगी।

खबर अच्छी हो या कोई बुरी,
कोई प्रतिक्रिया भी व्यक्त नही कर पा रही है,
कुछ बौरा-सी गई है जिन्दगी।